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Thursday, August 11, 2022

right to information act 2005 (23)

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তথ্য অধিকাৰে কাক সোমাই লৈছে?
মূলতঃ চৰকাৰৰ কাৰ্যপালিকা, বিধানমণ্ডল আৰু ন্যায়পালিকা এই আটাইকেইটা বিভাগক সামৰি লোৱা হৈছে। তদুপৰি চৰকাৰৰ পৰা প্ৰত্যক্ষ ভাবে বা পৰোক্ষভাৱে আৰ্থিক অনুদান, ৰাজসাহৰ্য্য, আৰ্থিক অনুগ্ৰহ, কৰ ৰেহাই লাভ কৰা বেচৰকাৰী সংন্থাসমূহকো যেনে স্বেচ্ছাসেৱী অনুষ্ঠান (NGO), ব্যক্তিগত ব্যৱসায়িক প্ৰতিষ্ঠান, উদ্যোগক আদি এই আইনৰ অধীনত লোৱা হৈছে। গতিকে জনসাধাৰণে এই বিভাগসমূহৰ পৰা উক্ত আইনৰ অধীনত তথ্য বিচাৰিব পাৰি।
ন্যায়ালয়ৰ কৰ্তৃত্ব:-
তথ্যৰ অধিকাৰ আইনৰ ২৩ ধাৰা অনুসৰি এই আইনৰ অধীনত জাৰি কৰা আদেশৰ বিৰুদ্ধে ন্যায়ালয়ৰ হস্তক্ষেপ বাৰণ কৰা হৈছে। অৱশ্যে ভাৰতীয় সংবিধানৰ ৩২ আৰু ২২৫ অনুচ্ছেদৰ জৰিয়তে প্ৰয়োজনবোধে উচ্চ ন্যায়ালয়ে এই ক্ষেত্ৰত হস্তক্ষেপ কৰিব পাৰে।
English translation :-

What is the right to information?
Basically, the executive branch of government, the legislature and the judiciary are all part of this division.  In addition, direct or indirect financial grants from the government, royalties, financial favors, tax-exempt non-governmental organizations such as voluntary organizations (NGOs), private business entities, entrepreneurs, etc.  The public can therefore seek information from these departments under the said Act.
Jurisdiction of the Court: –
Section 23 of the Right to Information Act prohibits the intervention of a court against an order issued under this Act.  Of course, Articles 32 and 225 of the Indian Constitution require the High Court to intervene in such cases.
Hindi translation :-
सूचना का अधिकार क्या है?
मूल रूप से, सरकार की कार्यकारी शाखा, विधायिका और न्यायपालिका सभी इस विभाजन का हिस्सा हैं।  इसके अलावा, सरकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय अनुदान, रॉयल्टी, वित्तीय एहसान, कर-मुक्त गैर-सरकारी संगठन जैसे स्वैच्छिक संगठन (एनजीओ), निजी व्यावसायिक संस्थाएं, उद्यमी, आदि।  अत: जनता उक्त अधिनियम के अंतर्गत इन विभागों से सूचना प्राप्त कर सकती है।
न्यायालय का क्षेत्राधिकार :-
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 23 इस अधिनियम के तहत जारी आदेश के खिलाफ अदालत के हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करती है।  बेशक, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 और 225 में उच्च न्यायालय को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है।
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